सलाह में क्या है

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 8 अक्टूबर को अपने साइबर क़ानून प्रभाग से सभी सोशल मीडिया मध्यवर्तियों को एक सलाह भेजी। उस पर फ़ाइल संख्या 16(2)/2026-CyberLaws है और संयुक्त सचिव अजित कुमार के हस्ताक्षर हैं। यह तुरंत प्रभाव से लागू है। मंत्रालय ने इसे प्रकाशित नहीं किया; इसका पाठ मीडियानामा के ज़रिए सार्वजनिक हुआ।

सलाह प्लेटफ़ॉर्मों से कहती है कि लोक व्यवस्था को प्रभावित कर सकने वाली झूठी, भ्रामक या हेरफेर की गई सामग्री पर “बढ़ी हुई सावधानी” बरती जाए। इसमें ख़ासतौर पर पुरानी तस्वीरें और वीडियो जिन्हें मौजूदा घटनाओं की तरह पेश किया जाए, कृत्रिम रूप से बनाई गई दृश्य-श्रव्य सामग्री, सार्वजनिक अधिकारियों या व्यक्तियों का रूप धरना, और हिंसा भड़का सकने वाली सामग्री गिनाई गई है।

इसके बाद चार व्यावहारिक माँगें हैं। प्लेटफ़ॉर्म आईटी नियमों में पहले से सूचीबद्ध श्रेणियों की ग़ैरक़ानूनी जानकारी को रोकें और उसका प्रचार बंद करें; जब सामग्री का लोक व्यवस्था पर असर हो तो अधिकृत सरकारी एजेंसियों की “रिपोर्टों और शिकायतों को प्राथमिकता दें”; “हेरफेर की गई, कृत्रिम रूप से बनी या भ्रामक सामग्री की पहचान कर उस पर उचित लेबल लगाएँ या संदर्भ दें”, ख़ासकर जब वह किसी मौजूदा घटना को दिखाती हो; और जागरूकता अभियान चलाएँ जो उपयोगकर्ताओं से साझा करने से पहले स्रोत, तारीख़ और प्रामाणिकता जाँचने को कहें। एक और खंड क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ समय पर सहयोग माँगता है। मीडियानामा बताता है कि क्रमांकन में खंड (v) छूटा हुआ है, जो प्रसारित प्रति में है ही नहीं।

नई दिल्ली की एक व्यस्त सड़क
यह सलाह भारत में काम करने वाले हर सोशल मीडिया मध्यवर्ती पर लागू होती है। प्रतीकात्मक तस्वीर। Roman Saienko · pexels · Pexels License

लेबल वाला खंड नियमों से ज़्यादा व्यापक क्यों है

भारत एआई से बने मीडिया को पहले से नियंत्रित करता है। आईटी नियमों में 10 फ़रवरी को अधिसूचित और 20 फ़रवरी से लागू संशोधन “कृत्रिम रूप से बनाई गई जानकारी” को ऐसी श्रव्य, दृश्य या दृश्य-श्रव्य सामग्री बताता है जो असली लगे, जिससे केवल पाठ उसके दायरे से बाहर रह जाता है।

सलाह के लेबल खंड पर ऐसी कोई सीमा नहीं है, वह फ़रवरी के संशोधन का ज़िक्र नहीं करता और सूची में “हेरफेर की गई” तथा “भ्रामक” जोड़ देता है। मीडियानामा का तर्क है कि इससे यह तय करना हर प्लेटफ़ॉर्म के भरोसे छूट जाता है कि भ्रामक क्या है — न कोई परिभाषा, न कोई तय प्रक्रिया।

पृष्ठभूमि

यह सलाह तब आई जब दिल्ली और मुंबई में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के ख़िलाफ़ प्रदर्शन चल रहे थे, और 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर प्रदर्शन बुलाया गया था। डेक्कन हेराल्ड ने लिखा कि यह तेलुगु फ़िल्म कलाकारों के एक डीपफ़ेक वीडियो के बाद भी आई, जो उसी हफ़्ते ख़ूब फैला।

आपत्ति

इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन ने 9 अक्टूबर को सलाह वापस लेने की माँग की। उसका मुख्य तर्क अधिकार का है: आईटी अधिनियम की धारा 79(2)(c) सुरक्षित आश्रय को अधिसूचित नियमों में तय सावधानी से जोड़ती है, और “बढ़ी हुई सावधानी” न अधिनियम में है, न नियमों में। सलाह में ऐसा कोई प्रावधान नहीं बताया गया जो मंत्रालय को इसे जारी करने का अधिकार देता हो, और इसे बिना नाम वाले किसी “सक्षम प्राधिकारी” ने मंज़ूरी दी।

संस्था यह भी कहती है कि पाठ नियम 3(1)(b)(v) से “जानबूझकर और इरादतन” शर्त हटा देता है और “सामाजिक शांति” जोड़ देता है, जो संविधान के अनुच्छेद 19(2) में अभिव्यक्ति पर रोक के आधारों में शामिल नहीं है। प्लेटफ़ॉर्मों से ऐसी सामग्री रोकने को कहना, उसके मुताबिक, वही पूर्व-सक्रिय निगरानी है जिसकी इजाज़त नियम सिर्फ़ चंद संकीर्ण श्रेणियों में देते हैं, और “अधिकृत सरकारी एजेंसियाँ” तथा “प्राथमिकता” दोनों अपरिभाषित हैं।

खुली योजना वाला दफ़्तर जिसमें ख़ाली मेज़ों की कतारें हैं
इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन सलाह को पूरा प्रकाशित करने या वापस लेने की माँग करता है। प्रतीकात्मक तस्वीर। Mikhail Nilov · pexels · Pexels License

किससे क्या माँगा जा रहा है

आईएफ़एफ़ चाहता है कि मंत्रालय सलाह पूरी तरह प्रकाशित करे, छूटा हुआ खंड समेत, बताए कि वह किस प्रावधान के तहत जारी हुई, और या तो उसे वापस ले या पुष्टि करे कि वह अधिनियम और नियमों से परे कोई बाध्यता नहीं बनाती। वह यह भी बताना चाहता है कि इसके तहत कौन-सी एजेंसियाँ शिकायतें दे रही हैं और कितनी।

प्लेटफ़ॉर्मों से वह माँगता है कि सलाह के तहत मिली हर सरकारी माँग सार्वजनिक की जाए, कार्रवाई केवल उन माँगों पर हो जो श्रेया सिंघल में तय मानक पर खरी उतरें, सलाह के आधार पर प्रदर्शन संबंधी सामग्री को पूर्व-सक्रिय ढंग से छाना या नीचे न किया जाए, और जब कोई कार्रवाई सरकारी शिकायत पर हो तो उपयोगकर्ताओं को बताया जाए।

आगे क्या देखना है

यह कि मेइटीवाई पाठ प्रकाशित करता है या नहीं, और कोई प्लेटफ़ॉर्म सार्वजनिक रूप से बताता है या नहीं कि वह इस पर क्या कर रहा है। अभी दोनों में से कुछ नहीं हुआ है, और जो सलाह प्रकाशित ही न हो, उसे बाहर से उसके असर से ही नापा जा सकता है।